नीतीश की कलम से : मोदीजी के बदलते रंग

देश के प्रधानमंत्री का नेतृत्व इतना खोखला और विचार इतने संकीर्ण भी सो सकते हैं, यह देखकर मैं अचंभित हूँ और दुखी भी। इस महान देश ने सदैव ऐसे नेता प्रस्तुत किए हैं जिनकी उदारता का उदाहरण हम अपने बच्चों को देते हैं और उन्हें गर्व से अनेकतामें एकता का पाठ सिखाते हैं। इस देश में आज तक ऐसे कोई भी प्रधानमंत्री नहीं हुए जिन्होंने अपनी जाति या धर्म को अपना परिचय बना दिया हो। इसलिए जब मैं देखता हूँ कि देश के वर्तमान प्रधानमंत्री सार्वजानिक तौर पर अपने धर्म और जाति को आधार बनाकर वोट मांग रहे हैं, दिल दहल जाता है। लगताहै जैसे किसी बेहद पवित्र और गौरवशाली परंपरा के साथ छेड़छाड़ की जा रही है। मैं इस बात का पुरजोर विरोध करता हूँ।

यह कैसा नेतृत्व है ? देश का प्रधानमंत्री कभी हिन्दू होने का दंभ भरता है, कभी पिछड़ा या अतिपिछडा होने का दावा करता है, तो कभी खुद को गुजराती व्यापारी बता आत्मविभोर हो जाता है। करोड़ों रुपये का सूट पहनता है, पूंजीपतियों से साठ गाँठ रखता है, पर जब वोट माँगना हो तो गरीब चाय वाला होने का प्रचार करता है। लोगोंकी आँखों में धूल झोंकता है और दूसरी पार्टी अथवा धारा के नेताओं पर बेस्वाद तंज कसता है। आखिर यह कैसा नेतृत्व है ? जो व्यक्ति लगातार अपनी जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र, और भाषा के आधार पर नेता होने का दावा करे, वह देश कैसे चलाएगा ?

जब अटल जी बिहार आए थे, तो उन्होंने एक सभा में कहा था- आप बिहारी हैं तो मैं अटल बिहारी हूँ। इस तरह के अनेक उदहारण हैं जहाँ महान नेताओं ने अपने उदार व्यक्तित्व से विविधता से भरे इस देश के हर व्यक्ति, वर्ग, जाति, समुदाय, संप्रदाय, क्षेत्र और भाषा को छुआ है, उसे समाहित किया है। मैं प्रधानमंत्री से अपील करता हूँ कि अपनी सकुंचित सोच से इस देश की महान परंपरा को धूमिल न करें। लोकतंत्र में हार-जीत सामान्य बात है। अत: आप बिहार में हार रहे हैं तो क्या हुआ, अपने दुर्भावों से देशवासियों का भरोसा मत गंवाइये।