नीतीश की कलम से : बिहार चुनाव में दिखा भाजपा का असली चाल चरित्र और चेहरा

आम चर्चा है कि भारतीय जनता पार्टी बिहार में बड़ी हार की ओर बढ़ रही है । हार किन कारणों से हो रही है यह भी बिहार में आम चर्चा का विषय है। नेतृत्व खोखला है और अपने ही नेताओं पर पार्टी को भरोसा नहीं है। नतीजतन, बाहरी नेता आकर बिहार के परिवर्तन की डफली बजा रहे हैं । पार्टी के पास बिहार के लिए कोई एजेंडा नहीं है। अतः बिहार के बाहर की घटनाओं को इम्पोर्ट करके उन्हें बिहार का एजेंडा बनाकर भुनाने की कोशिश हो रही है। और सबसे बड़ी बात यह है कि देश की सरकार ने बिहार के लिए कुछ ऐसा किया ही नहीं है जिसके दम पर वह जनता का भरोसा हासिल कर सके ।

पर आश्चर्य इस बात का है कि जो स्थिति बिहार में है वह बड़ी तेज़ी से देश में भी बनने लगी है । देश भर से पत्रकार बिहार आए हैं और इसकी चर्चा कर रहे हैं । हर रोज़ कोई न कोई घटना इस माहौल को पुख्ता कर रही है । निर्णायक नेतृत्व की बात करने वाले प्रधानमंत्री न तो निर्णय ले रहे हैं न ही नेतृत्व कर रहे हैं और उनके बड़बोले मंत्री बढ़ चढ़कर अपने बयानों से देश की संस्कृति व सभ्यता की धज्जियां उड़ा रहे हैं । इस माहौल में भाजपा की सरकार देश का संचालन कैसे करेगी ? वह बिहार में जनता के सामने बेमतलब परिवर्तन की डफली बजा जा रहे हैं और नाकाम हैं । परन्तु जिस तरह से माहौल बिगड़ रहा है, अगले कुछ महीनों में देश भर की जनता परिवर्तन का शंखनाद करने लगे तो आश्चर्य की बात नहीं होगी ।

पिछले कई महीनों से केंद्र की सरकार सब काम-धाम छोड़ कर बिहार के चुनाव में जुटी हुई है। इसी का नतीजा है कि गरीब की थाली से दाल गायब हो गई और सरकार देखती रही । घटनाएं होती रहीं, माहौल बिगड़ता रहा, पर सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाने की बजाए भाजपा के नेता हर घटना को बिहार के चुनाव में नफ़ा नुकसान के अनुसार भुनाते रहे । अब हालत यह है कि दाल महंगी है और दलित की जान सस्ती | लेखक पुरस्कार लौटा रहे हैं और पत्रकारों का सम्मान छिन रहा है। राष्ट्रपति विचलित हैं, प्रधानमंत्री चुप हैं, और देश भर में हलचल है।

यकीनन, बिहार में हार की झलक भारतीय जनता पार्टी के चेहरे और चरित्र को ऐसे उजागर करेगी इसका अंदाजा मुझे भी नहीं था।

  • devendra singh

    bihar me bhrastachhar ko mitana agla kadam hona chahiye.garibo ke rojgar barhane ke liye gramin vikas jaruri hai sath hi kisano ko bijli ,chakbandi, bhumi sudhar, unnat kismo ke beej, mini diary yojna, shramiko ko adhik majduri par kam hona chahiye.

  • प्रवीण मिश्रा

    करोड़ का नलजल घोटाला: दोषियों को बचाने का प्रयास

    भोपाल ()। लगातार सूखे की मार झेल रहे प्रदेश केबुंदेलखंड अंचल में पेयजल उपलब्ध कराने के लिए 100 करोड़ की नलजल योजना में हुए 80 करोड़ के घोटाले में शामिल अफसरों को बचाने के प्रयास शुरु हो गए है। इस मामले में हुई जांच कमेटी बना दी गई है। हालांकि इस मामले की जांच रिपोर्ट मे हुए खुलासे के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने पूरा मामला पीएचई मंत्री कुसुम मेहदेले के हवाले कर दिया। जिसके बाद दोषियों पर कार्रवाई की तैयारी शुरुकर दी गई है। अब माना जा रहा है कि पूरा मामला लोकायुक्त या फिर ईओडब्ल्यू को सौंपा जा सकता है। दरअसल इस मामले में हाkusum-mehdeleईकोर्ट के निर्देश पर जंच कमेटी गठित क गई थी। कमेटी ने जांचकर अपनी रिपोर्ट सामान्य प्रशासन विभाग को सौंप दी है। जिसमें बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ी और इसकेलिए तत्कालीन मुख्य अभियंता एनके कश्यप एवं तत्काीन अधीक्षक यंत्री सीके सिंह को पदस्थ कार्यपालन यंत्रियों को दोषी बताया गया है। राज्य प्रशासन ने गड़बड़ी पर लीपापोती करने के लिए एक और जांच कमेटी बना दी। इससे जांच कमेटी द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट को एक तरह से चुनौती दी गई है।
    पुन: जांच पर लगेगा विराम
    समीक्षा बैठक के दोरान पीएचई मंत्री कुसुम महदेेले ने मुख्यमंत्री से कहा कि बुंदेलखंड पैकेज के लिए तीन साल पहले नलजल योजनाओं में 100 करोड़ खर्च हो गए, लेकिन नलों से पानी की बूंद नहीं आ रही है। विभागीय जांच में 80 करोड़ का घोटाला सामने आया है। यह सुनते ही पीएचई अफसरों में सन्नाटा खिंच गया। इस पर कुछ देर चुप रहने के बाद सीएम ने पीएचई मंत्री से दोषी अफसरों के खिलफ कठोर कार्यवाही को कहा। सीएम द्वारा दिए गए निर्देश के बाद इस घोटाले की पुन: जांच कराने पर लगभग विरामलग गया है, बल्कि 80 करोड़ रुपए डकराने वाले अफसरों के खिलाफ मामला अब ईओडब्ल्यू या लोकायुक्त को भेजा जाना तय है।
    जांच में ये गड़बड़ी मिली
    गावों में पेयजल की जरूरत को ध्यान में रखकर योजनाएं नहीं बनाई गर्ईं फिर भी प्रशासकीय मंजूरी दे दी गई। घटिया स्तर के पाइप, मोटर पंप, स्टार्टर का इस्तेमाल किया। पाइपालाइन के काम में लेवलिंग सही नहीं की गई। कहीं पानी नहीं निकला तो कहीं बोर सूख गए पड़े हैं। योजनाएं पंचायतों को हस्तांतरित करने के लिए पूर्व सरपंचों से कागजों पर हस्ताक्षर करा लिए गए, जबकि वर्तमान सरपंचों को इसकी जानकारी ही नहीं है।